BRLPS
  

English version
        
      
सीखने हेतु मंच  |  साइट मानचित्र  |  रोजगार    
वेब  लोकल 


परियोजना का उद्देश्य और खाका क्या है?

इसका उद्देश्य है बिहार के ग्रामीण गरीबों की स्थिति में सुधार लाते हुए सामजिक एवं आर्थिक रुप से सशक्त करना। अतिनिपुणत को तलाशते हुए ग्रामीण स्तर पर जीविकोपार्जन और सामाजिक एवं आर्थिक रूप में सुधार लाना, ग्रामीण गरीबों के संस्थान को विकासशील बनाना एजेन्सी और वित्तिय संस्थान में तथा उत्पादक को और कार्य करने के योग्य बनाते हुए उनको पब्लिक एवं प्राईवट सेक्टर में उच्चपत तथा उत्तम समझौता सेवा, नगद और संसाधन को स्थापित करते हुए क्षमता निर्माण में नियोजित करना। सरकारी और निजी सेवा प्रदाता और सहज में परिवर्तन लानेवाली भूमिका में लघुवित्तिय और कृषि जन्य व्यवसायिक सेक्टर में प्रचार-प्रसार को विकसीत करना।



कौन सा क्षेत्र इस परियोजना के अन्तर्गत आता है?

बी.आर.एल.पी. बिहार के छह जिलों में कार्यरत है। ये जिला है, गया, नालन्दा, खगड़िया, मुजफ़्फ़रपुर, मधुबनी और पूर्णिया। इन जिलों के 5,00,000 से उपर परिवार 42 प्रखंडो में 4,000 गांव के बीच इस परियोजना मे कार्य करने की संभावना है।



यह परियोजना कैसे कार्य करता है?

बी.आर.एल.पी. कार्यक्रम का कार्यनीति है, उत्साहित संग्रह सामर्थ्यवान महिलाओं की सामुदायिक संस्थान "स्वयं सहायता समूह" के रुप में बनाना, जो सदस्य बचत, आन्तरिक ॠण और नियमित भुगतान से स्वतः स्व सम्पोषित संस्थान बन जायेगा। यह जो समूह बनेगा वह स्वबचत और आपसी लेनदेन पर आधारित होगा न कि एक ही सामुदायिक नियोहित अनुदान की राशि पर। सहयोग हेतु जो राशि संघ को दी जायेगी। वह अनुदानीत राशि होगी। प्रांरम्भिक स्तरीय स्वयं सहायता समूह बनाकर बाद मे ग्रामीण संघ बना कर फ़िर समूह स्तरीय सदस्यता पर आधारित ग्रामीण संस्थान सब के सब सामाजिक सेवा प्रदाता, स्वतंत्र व्यवसायिक अस्तित्व और बैंकिग कार्यप्रणाली के महत्वपूर्ण ग्राहक हो जायेंगें। इस तरह के सामुदायिक संगठन विभिन्न बाजारीय संस्थानों जो 'बैक इन्ड' सेवा जैसे कि बैंक और बीमा कम्पनी के प्रतिनिधी, प्राइवेट सेक्टर कॉरपोरेशन के प्रोक्यूरमेंट फ़्रेन्चैजीज और वितरन व्यवस्था जो विभिन्न प्रकार के सरकारी कार्यक्रम के लिए उपलब्ध कराते है, सहयोगी बन जायेगें।



यह परियोजना कैसे व्यवस्थित की जाती है?

इस परियोजना की गतिविधी कार्यान्वयन प्रखण्ड कार्यान्वयन इकाई पर आधारित एक प्रखण्ड कार्यान्वित दल के सम्पर्क द्वारा होता है। जिलों में बी.पी.आई.यू.एस. विभिन्न प्रयास का समन्वयन जिला परियोजना समन्वयन इकाई के द्वारा होत है।कुल मिलाकर इस परियोजना का प्रबन्धन राज्य परियोजना प्रबन्धन इकाई के द्वारा होगा जो पटना में स्थापित है।



माइक्रोफिनांस क्या है?

गरीबों एवं निम्न आयवर्गीय के वित्तिय सेवा के रुपा में प्रायः इस शब्द का प्रयोग प्रायः बहुत ही थोड़े अन्तर के ॠण और अन्य सेवा जो सेवा प्रदाता द्वारा दी जा रही है, वह अपने आप को लघु वित्तिय संस्थान के रुप में पहचान बनाता है।सामान्यतः इस संशान का झुकाव विकास के नये तरीके जो कि पिछले 30 सालों में छोटे ॠण वेतन विहीन व्यक्तियों लो बहुत कम या विना किसी गिरवी के बदले देने की व्यवस्था द्वारा विकसित किया गया है और होगा। इन तरीकों में सामूहिक लेनदेन और जिम्मेदारी, प्रार्म्भिक ॠण वचत आवस्यकट्ता क्रम्शः बद्ता ऱ्ण का आकार और भविष्य में लिये जानेवाले ॠण को चुकाने की अन्तर्गत सुरक्षा रहती है, यदि वर्तमान ॠण पुरा और तुरन्त चुका दिया गया हो।


पूंजी आर्थिक आन्दोलन को अग्रसारित करते हुए एक विस्तृत दुनिया बनाता है, जिसमे निम्न आय एवं घरेलु सम्साधनोम् द्वारा स्थायी रास्ता का प्रसार उच्चस्तरीय वित्तीय सेवा को राशि प्रदान करता है जो उसके आय प्रस्तुति क्रिया कलाप सुरक्षित रखता है। उसकी सेवा सिर्फ़ उधार तक ही सीमित नही है बल्कि इसमे बचत, बीमा और रुपये का लेन देन भी आता है।



जीविकोपार्जन क्या है?

जीविकोपार्जन (लाइवलीहुइ) की परिभाषा है बहुत अधिक परिचर्चा के बाद एकेडमिक और विकास के बीच मेंनिपुण्ता। (देखे उदाहरण के लिए इलिस, 1998; बैटरबर्री 2001; चैम्बरर्स एवं कॉनवेय, 1992; कार्नी 1998; बर्नसटेन, 1992; फ़्राम्सीसी, 2000,2002; रैडोकी, 2002) यह आम सहमति है कि लाइवली हुइ जीवन बनाये रखने की दिशा में रास्ता और साधन है। लाइवलीहुड की एक बहुत विस्तृत रुप में स्वीकार्य परिभाषा है। शाखारुप में रोर्बट चैम्बर्स और गोल्डेन कान्वेय के कार्य जीवन जीने के तरीको के लिए लाइवलीहुड (जीविकोपार्जन) अपने अन्दर क्षमता, साधान(साधान वस्तु और सामाजिक स्त्रोत दोनो को शामिल करते हुए) को अपने अन्दर समाहित करत है। (कार्नी-1998:4) कोएलिस(2000) लाइवलीहुडकी परिभाषा इस रुप मे बतलाते है- क्रिया कलाप, साधन और पहुचपथ संयुक्त रुप से संकल्पित है जीवन स्तर मे व्यक्ति विशेष और घरेलु साधन द्वारा सुधार लाना। विलियम (1984) ने लाइवलीहुड पर लंदन में सोढ किया 1980 के सुरुआती दौर मे उसने जीविकोपार्जन को हमेशा खोज का विषय या आश्रय निर्माण, रुपयों का लेनदेन और टेबुल पर रखने योग्य बनाना या बाजार में आदान-प्रदान करने से ज्यादा समझा।


यह एक प्रकार का मालिकाना और सुचना का प्रसार सामाजिक। सम्बन्धों का प्रबन्धन सार्थक व्यक्तित्व और समूह परिचय का भरपूर समर्थन और इन सभी कार्यो का दुसरों के साथ अन्तः सम्बन्ध का विषय है। ये सभी - उत्पादित विषय साथ मिलकर 'जीविकोपार्जन' का निर्माण करते है। मानवशास्त्री जैसे कि वालमैन के लिए जीविकोपार्जन एक 'अम्ब्रेला कन्सेप्ट' है, जो बताता है कि सामाजिक जीवन कई स्तरों में है और ये सभी स्तर एक दूसरे को ढके हुए है (दोनो तरीकों से जैसे जनता इनके बारे मे बात करती है और विश्लेषित करती है) 'जीविकोपर्जन' की यह धारणा एक महत्वपूर्ण विशलेषित विशेषता है।


इन परिभाषाओं और व्याख्याओं का मुख्य अंश सामान्यतः कुशलता पुर्वक लोगों द्वारा जीवकोपार्जन के लिए अपनाये गये विचारों को रेखांकित करना है जो उसके स्त्रोतों और उनके साथ करते है। जीविकोपार्जन या जीवनवृत्ति मूल रुप से संसाधनो (स्त्रोतों) के आसपास घूमता है (जैसे कि भूमि अनाज, बीज, श्रम, ज्ञान, पशु-धन सामाजिक - संबन्धन आदि) लेकिन राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के मुद्दों के कारण उत्पन्न समस्याओं से ये संसाधन एक दुसरे से अलग नही हो सकते।


जीवनवृत्ति या जीविकोपार्जन नये अवसरों को उत्पन्न कर स्वेच्छा से स्वीकार करने के लिए है। 'जीविकोपार्जन' प्राप्त करने में या इस तरह का कुछ करने में जोखिम और अनिश्चितता जैसेकि अत्यधिक वर्षा, संसाधनो में कभी, भूमि पर बड़ता बोझ, जीवन चक्र में मे बदलाव और पारिवारिक जुड़ाव्, महामारी, जैसे कि- एच्0आई0वी0/ एडस अव्यवस्थित बाजार, खाधानों के बढते दाम मंहगाई, तथा देशी और विदेशी प्रतिद्वंदिता से उसी समय लोगों को सफ़लतापुर्वक निकालना। ये अनिश्चितताएं नये उत्पन्न अवसरों, प्रभावित करेंगी कि कैसे सामग्री और सामाजिक संसाधानों का प्रबन्ध और उपयोग किया जाय, और उस पसन्द को भी जो लोगों द्वारा निर्मित है।



क्यों गांवों पर फ़ोकस शहरों पर नही?

विश्व के गरीबों की आबादी गांवों मे अधिक है और ये बहुत दशको तक रहेगी। इसलिए गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम में गांवो के लोगो पर विशेष ध्यान देना होगा, अगर उन्हें आगे बढाना है।


कृषि विकास के लिए विश्व राशि "ग्रामीण गरीबी प्रतिवेदन ('ग्रामीण गरीबी रिपोर्ट) 2000/2001 तथ्य पत्रक - "गरीब ग्रामीण"।


जब कि यह विस्तृत रुप से फ़ैले झोपड़े शहर की - तसबीर है, बच्चे रेलवे लाइन के पास कुड़े-कचरे के ढेर पर खेलते है और अन्नगिनत भीखारी, ट्राफ़िक सिग्नल पर लाइन लगाये रहते है। जो कि भारत प्रमाण पर आये पर्यटको को निराश करता है। 70% भारतीय अभी भी गांवो मे ही बसते हैं।


जहां पूर्ण गरीबी का पैमाना अभी भी निराशजनक है। सम्पूर्ण यूनाइटेड स्टेट्स में एक डालर से भी कम पर जीते मरते जनसंख्या की तुलना मे लगभग एक दिन के 50 पैसे हैं।अधिकतर ग्रामीण भूमीहीन मजदूर है, वे मौसमी चोटियों (शिखर मौसम) के दौरान अपना श्रम बेचने पर आश्रित है। जहां पुरस्कार बहुत कम और संभावनाए न के बराबर है। साल के बाकी दिनो में उनके पास दैनिक आय के कोई साधन नही है।


ग्रामीण गरीबो को लक्ष्य बताना सिर्फ़ गरीबी उन्मूलन के लिए ही नही है बल्कि यह ग्रामीण समुदाय में नव जीवन संचार और युवको को अपने गांव के ही संसाधनो के प्रति आशान्वित पुरुषवर्ग पलायन रोकने से भी है।हर साल अरबों ग्रामीण नवयुवक खास करके पुरुषवर्ग सहरों में काम के पलायन कर जाते है। गांवो से योग्यता और शक्ति बही जा रही है अर्थात पलायन कर रही है और शहरी संरचना पर दबाव बढता जा रहा है।


उड़ीसा मे कार्यरत हमारे सहभागी ने दावा किया है कि प्रशिक्षन से पूर्व इन गांवों से पलायन एक सामान्य घटना थी, लेकिन कार्य प्रशिक्षण के बाद प्रशिक्षित कारीगरों का पलायन 100% रुक गया है। इनमें से बहुत से अपना घर बना रहे हैं साथ ही साथ स्थानीय सामग्री से दुसरे के घर को भी बना रहे है। जीविका ट्रस्ट ने 1200 कारीगरों को कम लागत पर घर बनाने के कौशल का प्रशिक्षन दिया है जिसमें महिलायें भी शामिल हैं।



क्यों महिलाओं पर ही फोकस?

गरीबी लिंग तटस्थ नही है। महिलायें भूमि, ऋण, तकनीकी शिक्षा, स्वास्थय पर ध्यान और कौशलपूर्ण कार्य के उपर कम आनन्दपूर्ण नियंत्रण रख पाती हैं।


कृषि विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय कोष "ग्रामीण गरीबी रिपोर्ट 2000/2001 तथ्य पत्रक - गरीब ग्रामीण"।


भारत में महिलायें नियमित रुप में अलग-(वेभेदीकरण) अलग रहती हैं। लेकिन महिलायें न सिर्फ़ अपना भविष्य बदलने में बल्कि अपने परिवार और आस-पास के समुदाय का भी- भविष्य बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।


ग्रामीण महिलायें दैनिक रुप में अपना और अपने परिवार के जीवन को सुरक्षित रखने के लिए बहुत सारे काम करती हैं। महिलायें विशेष रुप से अपने परिवार के आर्थिक जीवनवृत्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पशुधन और खेती (उपज) की देखभाल करती हैं, साता ही सथ ये भी सुनिश्चित करती हैं कि घरेलु काम-काज कैसे पूरे होंगें। अबतक महिलायें अधिकृत रुप से स्वयं सहायता समूह अर लघु ॠण (माइक्रो क्रेडिट) समूह में एक साथ काम करने के द्वार यह दिखा चुकी है कि वे धीरे-धीरे लेकिन वर्षो पुराना भेदभाव से जरुर निकलेगीं और पूर्ण रुप से आर्थिक निर्भरता, सम्मान प्राप्ति अपने पक्ष में आवाज उठाना, अपने माइक्रो संस्थान को स्वयं प्रबन्धित कर कांवो को नवजीवन प्रदान करेगीं।


अगर एक महिला अपने परिवार को शिखाने मे सक्षम है कि पानी पीने से पहने उसे उबालना चाहिए ऐसे मे वे जलजनित अनेकों बिमारियों से वह उन्हें बचा सकती है। अगर एक महिला एक बकरी को जो बच्चे और दूध देती है उसे पालना जानती है तो वह सिर्फ अपने ही परिवार को ही सिर्फ पौस्टिक भोजन स्त्रोत नही देगी बल्कि वह अपने समुदाय के दूसरे परिवारों को भी पशुशावक को देने मे सक्षम हो सकती हैं।



गरीबी का अर्थ ग्रामीण भारत मे क्या है?

हमलोगों के लिए यह बेहद ही अति दुखदायी है कि इस उन्नत विश्व में भी सौ अरब भारतीय ग्रामीणों द्धारा दारुण मुश्किलों का सामना करना। महिलायें और बच्चे विशेषकर के पारिवारिक संघर्षो का बोझ ढोते है। करीब 280 अरब लोग जो ग्रामीण भारत में गरीबी रेखा के नीचे रह रहे है, यहीं इस गरीबी का अर्थ है।


पानी और पोषकतत्व के पहुंच से... महिलाओं और बच्चों को पानी, खाने और धोने के लिए पानीलाने हेतु मीलों चलना पड़ता है... 138 अरब ग्रामीण लोगों को साफ और स्वच्छ जल नहीं मिल पाता है।


आर्थिक आश्रय के पहुंच मे असमर्थ ... बिना किराये के धूप और मौनसुन वारिश के लिए...


स्वास्थ्य सुविधायें, स्वास्थ्य शिक्षा और स्वच्छता के पहुंच मे असमर्थ यह नहीं जानते हैं कि रोगों से किस तरह बचा जाय या कुपोषण को कैसे रोका जाय... 629 अरब लोग बिना किसी व्यवस्थित नालियों के रह रहे हैं।


शिक्षा पहुंच में असमर्थ लिखित सूचनाओं के पहुंच के काबिल नही है, बच्चों को पढ़ाना... 50% से उपर भारतीय महिलायें पढ़-लिख नही सकती और ग्रामीण इलाकों में ये और भी पहुंच से दूर हैं।


गांव के नीतिनिर्धारण मे पहुंच का अभाव... अपने अधिकार और गांव के किसी मसले में दावा करने तक में असमर्थ है।


धन (आय) कमाने के अवसर का अभाव... कुच भी, बानने के योज्य नही, यहां तक कि अलग ढ़ंग, आर्थिक भविष्य के स्वप्न को साकार करने, निर्भरता और भेद-भाव से बचने के लिए कोई भी आसार नही है।


यह भारत का दूसरा चेहरा है। ग्रामीणों की पहुंच पानी, आश्रय, स्वास्थ्य, खाद्ध सुरक्षा, साक्षरता और मानवीयपूर्ण गरीमा पहले के मुताबिक और भी क्षणभंग्रर है।